Shodas Sanskar (Sixteen Samskaras) & Ashram Vyavastha | IndianTechnoEra - IndianTechnoEra
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Shodas Sanskar (Sixteen Samskaras) & Ashram Vyavastha | IndianTechnoEra

Shodas Sanskar Ashram Vyavastha Sixteen Samskaras


Shodas Sanskar (Sixteen Samskaras) &  Ashram Vyavastha  | IndianTechnoEra


षोडश- सस्कार | सोलह संस्कार 

हिन्दू धर्म में सोलह संस्कारों (षोडश संस्कार) का उल्लेख किया जाता है जो मानव को उसके गर्भाधान संस्कार से लेकर अन्त्येष्टि क्रिया तक किए जाते हैं। [1]इनमें से विवाह, यज्ञोपवीत इत्यादि संस्कार बड़े धूमधाम से मनाये जाते हैं। वर्तमान समय में सनातन धर्म या हिन्दू धर्म के अनुयायी में गर्भाधन से मृत्यु तक १६ संस्कारों होते है।[2]
source: https://hi.wikipedia.org/

विभिन्न प्रकार के संस्कार निम्नप्रकार हैं:-


1. गर्भाधान संस्कार

गर्भाधान संस्कार के माध्यम से हिन्दू धर्म सन्देश देता है कि स्त्री-पुरुष संबंध पशुवत न होकर केवल वंशवृद्धि के लिए होना चाहिए। मानसिक और शारीरिक  रूप से स्वस्थ होने, मन प्रसन्न होने पर गर्भधारण करने से संतति स्वस्थ और बुद्धिमान होती है।



2. पुंसवन संस्कार

गर्भ धारण के तीन माह बाद गर्भ में जीव के संरक्षण और विकास के लिए यह आवश्यक है कि स्त्री अपने भोजन और जीवन शैली को नियम अनुसार करे। इस संस्कार का उद्देश्य स्वस्थ और उत्तम संतान की प्राप्ति है। यह तभी संभव है जब गर्भधारण विशेष तिथि और ग्रहों के आधार पर किया जाए।  



3. सीमन्तोनयन संस्कार

सीमन्तोनयन संस्कार गर्भधारण करने के बाद छठे या आठवें मास में किया जाता है। इस मास में गर्भपात होने की सबसे अधिक संभावनाएं होती हैं या इन्हीं महीनों में प्री-मेच्योर डिलीवरी होने की सर्वाधिक सम्भावना होती है।                                                           गर्भवती स्त्री के स्वभाव में परिवर्तन लाने, स्त्री के उठने-बैठने, चलने, सोने आदि की विधि आती है। मैडीकल साइंस भी इन महीनों में स्त्री को विशेष सावधानी रखने की सलाह देता है। भ्रूण के विकास और स्वस्थ बालक के लिए यह आवश्यक है। गर्भस्थ शिशु और माता की रक्षा करना इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। स्त्री का मन प्रसन्न करने के लिए यह संस्कार किया जाता है।


4. जातकर्म संस्कार

यह  बालक के जन्म के बाद किया जाता है। इसमें बालक को शहद और घी चटाया जाता है। इससे बालक की बुद्धि का विकास तीव्र होता है। इसके बाद से माता बालक को बालक को स्तनपान कराना शुरू करती है। इस संस्कार की वैज्ञानिकता है कि बालक के लिए माता का दूध ही श्रेष्ठ भोजन है।  


5. नामकरण संस्कार

इस संस्कार का बहुत अधिक महत्व है। जन्म नक्षत्र को ध्यान में रखते हुए शुभ नक्षत्र में बालक को नाम दिया जाता है। नाम वर्ण की शुभता का प्रभाव बालक पर सम्पूर्ण जीवन रहता है। यह बालक के व्यक्तित्व का विकास करता है।  


6. निष्क्रमण संस्कार

इस संस्कार में बालक को सूर्य-चंद्र की ज्योति के दर्शन कराए जाते हैं। जन्म के चौथे मास में यह संस्कार किया जाता है।  इस दिन से  बालक को बाहरी वातावरण के संपर्क में लाया जाता है। शिशु को आस-पास के वातावरण से अवगत कराया जाता है।  


7. अन्नप्राशन संस्कार

इस संस्कार के बाद से बालक को माता के दूध के अतिरिक्त अन्य खाद्य पदार्थ देने शुरू किए जाते हैं। चिकित्सा विज्ञान भी यही कहता है कि एक समय सीमा के बाद बालक का पोषण केवल दूध से नहीं हो सकता। उसे अन्य पदार्थों की भी जरूरत होती है।  इस संस्कार का उद्देश्य खाद्य पदार्थों से बालक का शारीरिक और मानसिक विकास करना है। यही इसकी वैज्ञानिकता है।   


8. चूड़ाकर्म संस्कार

इसे मुंडन संस्कार के नाम से भी जाना जाता है। इसके लिए शिशु के जन्म के बाद के पहले, तीसरे और पांचवें वर्ष का चयन किया जाता है। शारीरिक स्वच्छता और बौद्धिक विकास इस संस्कार का उद्देश्य है। माता के गर्भ में रहने के समय और जन्म के बाद दूषित कीटाणुओं से मुक्त करने के लिए यह संस्कार किया जाता है। स्वच्छता से शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास अधिक तीव्र गति से होता है। यह विज्ञान भी मानता है।  


9. कर्णभेद संस्कार

इस संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इसका मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है।


10. उपनयन, यज्ञोपवीत संस्कार

बच्चे की धाॢमक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह संस्कार किया जाता है।  इसमें जनेऊ धारण कराया जाता है। इस संस्कार का सम्बन्ध लघु या दीर्घ शंका के बाद स्वच्छता से है। इसे कान में लपेटने से एक्यूप्रैशर ङ्क्षबदु पर दबाव पड़ता है, जिससे लघु या दीर्घ शंका से बिना किसी कष्ट के निदान हो जाता है।

                उपनयन संस्कार जिसमें जनेऊ पहना जाता है और विद्यारंभ होता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। सूत से बना वह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है।


11. विद्यारम्भ, देवारंभ संस्कार

विद्यारम्भ का अभिप्राय: बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिए भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। मां-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथाओं आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शिक्षा विज्ञान की ओर  प्रथम कदम है।  यही यह संस्कार बताता है।

                                            इस संस्कार के द्वारा यह यत्न किया गया है कि इस धर्म के हर व्यक्ति को अपने धर्म का वैज्ञानिक ज्ञान होना चाहिए। यह जीवन के चतुर्मुखी विकास के लिए बहुत उपयोगी हैं।


12. दीक्षांत, समावर्तन, केशांत संस्कार

गुरुकुल से विदाई के पूर्व यह संस्कार किया जाता है। आज गुरुकुल परम्परा समाप्त हो गई है, इसलिए यह संस्कार अब नहीं  किया जाता है। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था।  

                                    इस संस्कार का उद्देश्य बालक को शिक्षा क्षेत्र से निकाल कर सामाजिक क्षेत्र से जोडऩा है। गृहस्थाश्रम में प्रवेश का यह प्रथम चरण है। बालक  का आत्मविश्वास बढ़ाने, समाज और कर्म क्षेत्र की परेशानियों से अवगत कराने का कार्य यह संस्कार करता है।  


13. विवाह संस्कार

विवाह संस्कार अपने बाद अपनी पीढ़ी का अंश इस दुनिया को दिए जाने का मार्ग है। परिपक्व आयु में विवाह संस्कार प्राचीन काल से मान्य रहा है। समाजिक बन्धनों में बांधने और अपने कर्मों से न भागने देने के लिए बच्चों को विवाह संस्कार करके एक अदृश्य डोर में बांध दिया जाता है।  


विवाह के विभिन्न प्रकार 

  • 1.ब्रह्म विवाह : दोनों पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या की इच्‍छा‍नुसार विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। इस विवाह में वैदिक रीति और नियम कापा लन किया जाता है। यही उत्तम विवाह है|

  • 2.देव विवाह : किसी सेवा धार्मिक कार्य या उद्येश्य के हेतु या मूल्य के रूप में अपनी कन्या को किसी विशेष वर को दे देना 'दैव विवाह' कहलाता है। लेकिन इसमें कन्या की इच्छा की अनदेखी नहीं की जा सकती । यह मध्यम विवाह है।

  • 3.आर्श विवाह : कन्या -पक्ष वालों को कन्या का मूल्य देकर (सामा न्यतः गौदान करके) कन्या सेविवाह कर लेना 'अर्श विवाह' कहलाता है। यह मध्यम विवाह है।

  • 4.प्रजा पत्य विवाह : कन्या की सहमति के बिना माता -पिता द्वारा उसका विवाह अभिजात्य वर्ग (धनवान और प्रतिष्ठित) के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है।

  • 5.गंधर्वविवाह : इस विवाह का वर्तमान स्वरूप है प्रेम विवाह। परिवारवालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है। वर्तमान में यह मात्र यौन आकर्षण और धन तृप्ति हेतु किया जाता है, लेकिन इसका नाम प्रेम विवाह दे दिया जाता है। इसका नया स्वरूप लिव इन रिलेशनशिप भी माना जाता है।

  • 6.असुर विवाह : कन्या को खरीद कर (आर्थि क रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।

  • 7.राक्षस विवाह : कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है।

  • 8.पैशाच विवाह : कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा , मानसि क दुर्बलता आदि ) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक संबंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है।


14. वानप्रस्थ संस्कार 

गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ यथा शीघ्र करके, उत्तराधिकारियों को अपने कार्य सौंपकर अपने व्यक्तित्व को धीरे-धीरे सामाजिक, उत्तरदायित्व, पारमार्थिक कार्यों में पूरी तरह लगा देने के लिए वानप्रस्थ संस्कार कराया जाता है। इसी आधार पर समाज को परिपक्व ज्ञान एवं अनुभव सम्पन्न, निस्पृह लोकसेवी मिलते रहते हैं।

वानप्रस्थ जीवन का तीसरा आश्रम है जिसमें मनुष्य वन में निवास करता है लेकिन उसके परिवार के लोग किसी समस्या के समाधान के लिए उसके पास आ कर सलाह ले सकते हैं। 


15. सन्यास संस्कार 

जीवन का चौथा आश्रम है जिसमें मनुष्य सांसारिक आसक्ति से विरत हो जाता है और परिवार तथा उसकी समस्याओं से भी उसे कोई मतलब नहीं रहता।


16. अंत्येष्टि संस्कार

जब मनुष्य का शरीर इस संसार के कर्म करने योग्य नहीं रह जाता है, मन की उमंग भी समाप्त हो जाती है, तब इस शरीर का जीव उड़ जाता है। पंचतत्वों से बने इस नश्वर शरीर के दाह संस्कार का विधान है जिससे शरीर के वायरस और बैक्टीरिया समाप्त हो जाएं। क्योंकि जैसे ही इस शरीर का जीव निकलता है, शरीर पर वायरस और बैक्टीरिया का जबरदस्त हमला होता है। इस प्रकार यह भी एक वैज्ञानिक  संस्कार है।




आश्रम व्यवस्था 

प्राचीन भारत में ऋषि -मुनि वन में कुटी बना कर रहते थे। जहां वे ध्यान और तपस्या करते थे। उक्त जगह पर समाज के लोग अपने बालकों को वेदाध्यन के अलावा अन्यद्याएं सीखने के लिए भेजते थे। धीरे-धीरे यह आश्रम संन्या सियों , त्यागियों , विरक्तों धा र्मि क या त्रि यों और अन्य लो गों के लि ए शरण स्थली बनता गया ।

यहीं पर तर्क-वितर्क और दर्शन की अनेकों धारणा एं विकसित हुई। सत्य की खोज, राज्य के मसले और अन्य समस्याओं के समाधान का यह प्रमुख केंद्र बन गया । कुछ लोग यहाँ सांसारिक झंझटों सेबचकर शांति पूर्वक रहकर गुरु की वाणी सुनते थे। इसे ही ब्रह्मचर्य और संन्या स आश्रम कहा जा ने लगा ।


1. ब्रह्मचर्य आश्रम

व्यक्ति के जीवन का प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्याश्रम है, ब्रह्म का आशय महान एवं चर्य का आशय है, चलना अर्थात महानता के मार्ग पर चलना। इस प्रकार इसका अर्थ है ऐसे मार्ग पर चलना जिसमें व्यक्ति महान बन सके। इस हेतु मनुष्य इस अवस्था में इन्द्रीय निग्रह, अनुशासित जीवन, पवित्रता, और त्याग का पालन करके स्वयं का आध्यात्मिक विकास कर सके। मोक्ष प्रप्ति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिये इन दृष्टियों से व्यक्ति का विकास अवश्य है। ब्रह्मचारी गुरुकुल के नियमों का पालन करते हुए ज्ञानार्जन करता था। पठन-पाठन की समाप्ति पर उसे प्रतीक रूप में स्नान कराया जाता था। जिससे वह स्नातक कहलाने लगता था। विद्याध्यन की समाप्ति के बाद गुरू से बिदा लेकर अपने घर लौट आता था। इसे समावर्तन संस्कार की संज्ञा दी गई है। इसके बाद व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था।


2. गृहस्थाश्रम

गृहस्थाश्रम दूसरी एवं वह सीढ़ी है, जो विवाह के उपरान्त प्रारम्भ होती है और पचास वर्ष तक बनी रहती है। वस्तुत: यही मूल आश्रम है। यह आश्रम सच्ची कर्मभूमि है जिसमें ब्रह्मचर्य आश्रम की शिक्षाओं को मूर्तरुप दिया जाता है। गृहस्थाश्रम धर्म, अर्थ एवं काम की त्रिवेणी है। एक गृहस्थ को जीव हत्या, असंयम, असत्य, पक्षपात् शत्रुता, अविवेक, डर, मादक द्रव्यों के सेवन, कुसंगति, अकर्मण्यता और चाटुकारिता से दूर रहना चाहिए। गृहस्थ से अपेक्षा की जाती है, कि वह माता-पिता, आचार्यों, वृद्धों, ऋशियों का आदर करे, पत्नी के प्रति उसका व्यवहार धर्मानुकूल धर्म एवं काम की मर्यादाओं के अनुसार हो। 


3. वानप्रस्थाश्रम

यह आश्रम 51 से 75 वर्ष के बीच माना गया है। इस आश्रम में प्रवेश के बाद व्यक्ति जंगल में कुटिया बनाकर रहता था तथा सांसारिक सुखों का पूर्णतः परित्याग कर देता था। वह जंगली कंदमूल-फल खाकर अपने जीवन का निर्वाह करते हुए जन कल्याणकारी कार्यों को सम्पादित करता है। वह पूरे संसार को अपना परिवार समझने लगता है। जटा, दाढ़ी बढ़ाकर वृक्षों की छाल पहनकर जमीन पर सोता है। इन्द्रिय संयम रखना, जीवों के प्रति दयाभाव रखना, गौ सेवा तथा अतिथि सत्कार करना उसके परम कर्तव्य हैं। अतः इस आश्रम में मनुष्य को आत्म शुद्धि के साथ-साथ लोक कल्याण के उद्देश्य की पूर्ति भी करना होती है। वानप्रस्थ अपने जीवन के अनुभव और त्यागमय आदर्शांे के आधार पर ब्रह्यचर्यों की शिक्षा प्रदान करता है।


4. संन्यासाश्रम 

यह आश्रम 76 से 100 वर्ष की आयु के बीच का है। यह जीवन का अन्तिम पड़ाव होता है। एक वानप्रस्थी को सभी सांसारिक बन्धनों एवं मोह को छोड़कर अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके संन्यासी हो जाना चाहिए। इस आश्रम में एक सन्यासी का कर्तव्य है, कि वह भिक्षा पर निर्भर रहे, अधिक भिक्षा न माँगे, जो कुछ मिले उसी में सन्तोष करे, मोटे वस्त्र पहने, वृक्ष की छाया में सोये, किसी का अनादर न करे, प्राणायाम के द्वारा इन्द्रियों का हनन कर दे व सुख-दु:ख का अनुभव न करे। 


आश्रम व्यवस्था का उद्देश्य

मानव जीवन दर्शन के विकास और सामान्य कल्याण के लिये समन्वय की भावना जहां ब्रह्मचर्य आश्रम में व्यक्तिगत की भावना निहित है। वहीं गृहस्थ आश्रम में पारिवारिक कल्याण, वानप्रस्थ आश्रम में ग्रामीण तथा सामुदायिक तथा सन्यास आश्रम में विश्वकल्याण की भावना निहित है। क्रमशः ज्ञान, कर्म और व्यक्ति का समन्वय ही महत्वपूर्ण है। व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के साथ-साथ भोग और त्याग का समन्वय करना, ऋण, पंचमहायज्ञ, पुरुषार्थ और संस्कारों की पूर्ति विभिन्न आश्रमों के माध्यमों से करना ही आश्रम का प्रमुख उद्देश्य है।


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